मंगलवार, 4 जुलाई 2023

NASTIK AUR KUTTE KI KAHANI/ नास्तिक और एक कुत्ते की कहानी

 एक नास्तिक और कुत्ते की कहानी, एक बहुत ही बड़ा नास्तिक था। वह हर एक मठ मंदिर और आश्रम में जाकर , आत्मा , मन शरीर, भगवान कर्म, ऐसे न जाने कैसे कैसे सवाल पूछता रहता था, पर उसका उसे मन चाहा जवाब नही मिलता था, फिर एक दिन वह महान तपस्वी साधु के पास जाकर अपने सवाल पूछा , पर उस महान तपस्वी साधु भी उसका जवाब न दे सका , फिर उस साधु ने , उस नास्तिक से कहा , की एक गांव है वहा एकनाथ नाम का एक इंसान रहता है , उससे जाकर अपने सवाल पूछो, अगर उससे भी जवाब नही मिला तो समझो की, इस संसार में कोई नही है ऐसा जो तुम्हारे सवाल का जवाब देगा , वह नास्तिक इस एकनाथ को ढूंढने निकला , पहुंचते पहुंचते सुबह हो गई, गांव पोहचतेही उसने किसी गांव वाले से पूछा की एकनाथ कहा रहता है, उसने कहा वहा एक शंकर का मंदिर है वही मिलगा एकनाथ, मंदिर देखते ही उसके चेहरे पे खुशी आई , उसने मन ही मन सोचा की अब मेरे सवालो का जवाब मिलेगा , वह जैसे ही मंदिर के भीतर गाया, उसने देखा की एक आदमी शंकर के पिंडी के ऊपर पाव रखकर सो रहा है , उसको बहुत अजीब लगा , फिर सोचा कोई पागल मालूम होता है , साधु संत तो ब्रह्म मुहूर्त में उठते है, शायद एकनत कही ध्यान करते होगे। फिर उसने एक मंदिर ने आने वाले व्यक्ति से पूछा की एकनाथ कहा मिलेंगे , उसने कहा यही तो है एकनाथ , अब सो रहे है, उस नास्तिक के मन में जोर से झटका लगा , और सोचा ये कैसा इंसान है, शंकर के पिंडी के ऊपर पैर रखकर सो रहा है, मैं नास्तिक तो हु पर इतना भी नही, मेरे मन में कभी भी ऐसी सोच नही आयेगी और नही मै ऐसी हिम्मत करूंगा , भला शंकर के पिंडी पे कोई पैर रखकर थोड़ी सीता है, सुबह के आठ बज चुके है, साधु संत तो ब्रह्म मुहूर्त पर उठ जाते है, मेरा यह आना व्यर्थ हुवा, यह से जाना ही उचित है, फिर मन में खयाल आया की आया हु तो इस एकनाथ से मिलके की जाता हु, उस तपस्वी ने मुझे इसे मिलनेको कहा था , अब आया हू तो मिलकर ही जावूंगा, वह नास्तिक बहुत निराश होकर उस एकनाथ के उठने की रह देखता रहा, करीब १० बजे एकनाथ उठे , उस नास्तिक ने उनसे कहा की साधु संत तो ब्रह्म मुहूर्त पर उठते है , तुम तो अभी उठे है , एकनाथ ने कहा , मैं जभी उठता हु तो ब्राम्ह मुहूर्त होता है, क्यों की मै ही ब्रह्म हु, और तुम भी ब्रह्म ही हो, जब उठे तब ब्रह्म मुहर्थ होता है, उस नास्तिक ने कहा पर तुम शंकर के पिंडी पर पैर रखकर क्यू सोए थे, तब उसने कहा , जो दिखाता है वह कभी कभी सत्य नही होता , मन की आंखों से देखोगे तो चारो तरफ शंकर की शंकर है , और ये सब उसका ही तो है, मैं भी तुम भी, इस नास्तिक को कुछ अजीब लगा , उसने सोचा यह आके मेरा समय व्यर्थ ही नष्ट हो गया , फिर उस नास्तिक ने कहा की तुम नहाते नही हो क्या , उसने कहा मेरा मन बुद्धि , एकदम साफ है , फिर शरीर साफ रखने की क्या जरूरत , मन किया तो नहा लेता हु , नहीतो ऐसे ही रहता हु, फिर उस नास्तिक ने सोचा यह रुकने का कोई मतलब नही बनता , उसने एकनाथ से कहा की मैं जाता हु , एकनाथ ने कहा आज रूक जावो खाना खाकर जाना देर बहुत हो गई है, फिर एकनाथ ने गांव में भिक्षा मानकर कुछ आटा जमा किया , और आटे की बाटी बनाने लगा , उसने जैसे ही एक बाटी चूले पर से निकली , वहा से एक कुत्ता आकार उस बाटी को मुंह में लेकर भागने लगा , यह देखकर एकनाथ जोर से चिल्लाया , रूक जा राम , बहुत मरूंगा , ऐसा बोलकर कुत्ते के पीछे भागा , यह देखकर वह नास्तिक हैरान हवा,वह नास्तिक भी उसके पीछे भागने लगा। उसको लगा की अब ये पागल कुत्ते को मार डालेगा ,उस कुत्ते की जान बचाने वह भी भागा, एकनाथ ने कुत्ते को पकड़ा और जोर जोर से चिल्लाया की राम ऐसा गलत काम मत करो,एक तो एक मिल दौड़ाया मेरी बाटी लेके भागा , तुझे मैने हजार बार कहा की , बाटी को घी में डालने के बाद ले जा , सुखी बाटी अच्छी नहीं लगेगी तुझे , तू मेरी सुनता ही नही, वह  नास्तिक ये सब दृष देख रहा था, फिर उस एकनाथ ने कुत्ते के मुंह से बाटी निकली , वह बाटी कुत्ते की लार से पूरी गीली हो गई थी , बाटी हात में लेकर कुत्ते को गोदी में उठाकर वापस मंदिर के तरफ जाने लगा , और उसने उस कुत्ते की लार से भरी झुटी बाटी घी में पूरी डुबाकर फिर उस कुत्ते को दी , और कहा फिर जो तू सुखी बाटी लेकर खाने लगा तो तेरी हड्डी पसली एक कर दूंगा , घी वाली बाटी लेकर जाना, उस नास्तिक की आंखे खुल गई और उसने आखरी सवाल किया की कुत्ते का नाम राम क्यू रखा , उसने कहा देखो तो हर जगा राम है , मुझमें तुम्हारे भीतर, हर सजीव निर्जीव वास्तु में , फिर क्यों जाना मंदिर में मठ में , सब कुछ अपने भीतर है , यह सुनकर उस नास्तिक की आंखे खुल गई, और सत्य के दर्शन उसे उस दिन हो गए , उसने एकनाथ जी को धन्यवाद दिया और उनके पैर पड़कर हसते हंसते लौट गया।

बोध।। इस कहानी का बोध यह है, को सब कुछ अपने भीतर है , बस उसे जानना और समझना चाहिए, मन और कर्म साफ हो तो , ब्रह्म भी हम है और राम भी, 

।।धन्यवाद।।



गुरुवार, 22 जून 2023

EK DEVDUTT, AUR YAMRAJ KI KAHANI/एक देवदुत्त और यमराज की कहानी

एक देवदुत्त और यमराज की कहानी, एक दिन यमदाज के अदेशा नुसार देवदूत एक स्त्री के प्राण हरने पहुंच गए , प्राण हरने के समय देवदूत ने देखा की, उस महिला की तीन छोटी छोटी बेतिया है , उसमे से एक मां के मृत शरीर के स्तन से दूध पी रही है , दूसरी रोते रोते थक गई और वैसे ही सो गई , उसके आंख के आसू भी अभी सूखे नही, और तीसरी उस मृत मां के बाजू में बैठ कर बहुत जोर जोर से रो रही हैं, यह देख कर देवदूत की आखें भर आई , उसे बहुत ही दया आई , उसने सोचा की मैं अगर इसके प्राण हरलू तो मुझे पाप लगेगा , उसे उन छोटी छोटी बच्चियों पे तरस आया, उसने मन ही मन में सोचा की मैं यमराज से उस मां के लंबे अयु के लिए प्रार्थना करूंगा , और वे देवदूत यम लोक पहुंचे, तब यमराज ने कहा ही कहा है उस स्त्री के प्राण , देवदूत ने यमराज से कहा , उस महिला के तीन छोटी छोटी बेतिया है , बहुत रो रही है, उन्हें मां की जरूरत है , यमराज मैं आपसे विनती करता हु की , उन्हे थोड़ी आयु दे , वे लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएगी तभी मैं उसके प्राण हर लूंगा , इस पर यमराज बहुत ही क्रोधित हो उठे , उसने देवदूत से कहा, तुम कोन होते हो नियति को बदलने वाले, तुमने मेरा आदेश नही माना , तुमने नियति को बदलना चाहा, ये भी पाप है , इसीलिए मैं तुम्हे श्राप देता हु , जबतक तुम अपने मूर्खता पर तीन बार हसोंगे तब तक तुम्हें पृथ्वी लोक पे रहना होगा , देवदूत ने यमराज का श्राप स्वीकार किया और पृथ्वी लोक पर साधारण मनुष्य के भाती पहुंच गए, एक दिन एक आदमी गांव से शहर जा रहा था , वह एक बहुत गरीब चमार था, थोड़े बहुत पैसे इकट्ठा करके , बीवी और बच्चो के लिए शहर से कपड़े और बच्चो के लिए कुछ खिलोने लाने जा रहा था , तभी उसने देखा की एक आदमी नग्न अवस्था इतनी तेज ठंड में ठिठुर कर सो रहा है , उसके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं है , उस चमार ने अपने शरीर पे से एक कपड़ा  उतारा और उस आदमी को दिया , फिर उसे पता चला की उसने कही दिनों से खाना भी नही खाया , उस चमार को उस आदमी की बहुत दया आई,और उसने उसे खाना खिलाया और नए कपड़े भी दिए, उस चमार के सारे पैसे खर्च हो गए , बीवी और बच्चो के लिए कुछ नहीं ले पाया , वह बहुत ही दुखी था , पर उसे इस बात की भी खुशी थी की मैने किसी गरीब की मदट की , घर जाकर बीवी और बच्चो मुझापे गुस्सा करेंगे , पर उसने उसकी फिकीर नही की, उसने उस आदमी से पूछा की तुम रहते कहा हो , उस आदमी ने कहा , कही नही , मेरा कोई घर नही , ना की कोई सगा संबंधी, रिश्तेदार कोई नही है मेरा इस दुनिया में, उस चमार को उसकी दया आई, और उसने कहा की तुम मेरे घर चलो, पैसे तो सारे खर्च हो गए और तुम्हे भी साथ ले जा रहा हु , आज घर में मेरी खैर नहीं, बीवी मुजपर गुस्सा करेगी , बहुत क्रोधित हो उठेगी चिल्लाएगी पर तुम शांत रहना , कुछ दिन के बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा , मैं तुम्हे चप्पल , जूते सिलना सिखावूंगा, और उसे घर ले गया , अपने बीवी को सारी बात बताई , बीवी बहुत क्रोधित हो गई , चिल्लाने लगी , भला बुरा कहने लगी , बच्चे रो रहे थे , बहुत आस लगाए जो बैठे थे, उतने में वह आदमी हसने लगा , और उसने मन ही मन सोचा , की जो तुम्हारे घर आया है वह एक देवदूत है , उसके आने से ही सब पीड़ा दुख दरिद्रता, खत्म हो जाते है , सुख शांति संपति इसकी बरसात होती है , पर वह लोग समझ नही पाए , उनकी दृष्टि वह सब नही देख पाए इसलिए वह हस पड़ा , चमार ने पूछा तुम क्यों हस रहे थे , उसने कहा मैं तो अपने मूर्खता पे हसा हु , इस चमार ने पूछा पर क्यू, देवदूत ने कहा समय आने पर तुम्हे सब बता दूंगा , कुछ ही दिनों में उस देवदूत ने चमार के सारे काम सिख लिए। , वह अब बहुत ही सुंदर और बेहतर चप्पल जूते सिलने लगा , देखते ही देखते पूरे शहर में उसके जूते और चप्पल बिकने लगे , उसने कभी सोचा भी नही होगा उतना धन उस चमार ने कमाया , बहुत दूर दूर से लोग चप्पल और जूते सिलवाने आते थे , राजा के दरबारी, मंत्री , सभी वहा से ही , चप्पल बनवाते , राजा के जूते भी अब वही देवदूत बनवाता था , एक दिन एक मंत्री बहुत की कीमती चमड़ा लेके चमार के पास आया  , और राजा के लिए नए जूते इस चमड़े से सिलवाने के लिए कहा, उस मंत्री ने कहा की तुम्हे जितने दिन चाहिए उतने लो, पर जूते अच्छे बनवाना , उस देवदूत ने कहा ठीक है , दो ही दिनों में उसने उस चमड़े से एक चप्पल सिलवाई , यह देख कर चमार क्रोधित हो उठा , अरे ये तुमने क्या किया , जूते सिलवाने के बजाय तुमने चप्पल सिलवाई , यह तो मरने के बाद सिलवाती है , अब राजा हमे दंड देगा , सजा देगा , हमे गाव से बाहर निकले गा, ये तुमने क्या किया , यह सुनकर वह देवदूत दूसरी बार हसा, चमार ने पूछा की तुम क्यों हस रहे हो ,क्या तुम्हे जरा भी डर नहीं है , देवदूत ने कहा , समय आने पर मैं तुम्हे सब कुछ बता दूंगा, उतने ने एक मंत्री ने , उस चमार को खबर दी, की तुम जूते मत सिलवाना , राजा मार गया , अब तुम चप्पल सिलवाना , वह चमार आचार्य हो गया , क्यू की देवतुत जो था वह, वह मानुष के दृष्टि से आगे देख सकता था, देवदूत को और एक बार अपने मूर्खता पे हसना था, और वह हस पड़ा, फिर एक दिन एक महारानी दूर देश से आई अपने बेटियो के लिए चप्पल बनवाने , उस महारानी और उसके साथ उसकी तीन लड़कियां भी थी , इस महारानी का थाट देखने जैसा था, सोने के रथ में आई थी बहुत सारे सिपाही अंगरक्षक, के साथ आई थी , बहुत सारे आभूषण थे , वह देख चमार देखते ही रह गया , उस महारानी ने कहा की मुझे और मेरी तीन बेटियो के लिए जूते सिलवाने है , उस देवदूत ने कहा अपने बेटियो को बुलाओ मैं उनके पेरो का का माप लेता हु, जैसे ही उसने उस तीन लड़कियों को देखा , देवदूत को वह सब याद आया , उसने महारानी से कहा , अगर मैं गलत नही तो ये तीन लड़कियां तुम्हारी नही है , महारानी ने कहा हा, यह तो मुझे एक मृत मां के शरीर के पास मिली , बहुत रो रही थी, कोई जान पैचनाने वाला भी नही था , और वे बहुत ही सुंदर थी , मुझे कोई भी अपनी संतान नहीं थी , तो मैने इन्हे गोद ले लिया  यह सुनकर वह देवदूत तीसरी याने आखरी बार अपने मूर्खता पर हस पड़ा, चमार ने कहा तीन बार तुम हस दिए , अब तो मुझे वह राज बताओ, देवदूत ने अपने असली रूप में आके उस चमार के परिवार को दर्शन दिए , और अपनी हकीकत बतादी, सभी धन्य हुवे , देवदूत सबको अपना आशीर्वाद देके वापस यम लोक में चले गए, यमराज से क्षमा मांगी और अपने काम पी जुड़ गए
इस कहानी का बोध यह है , कभी कभी हैं कुछ चीजे नियति के हात सोप देना चाहिए , परमात्मा ने हमारे लिए कुछ न कुछ जरूर सोचा होगा , और हमारे बड़ो की आज्ञा का अपमान नही करना चाहिए, मां , बाप , हमारे गुरु होते है , उनकी आज्ञा का पालन हमे जरूर करना चाहिए , क्योंकि उनकी दृष्टि हमारे दृष्टि से कही अधिक लंबे तक देख सकती है , फिर हमें जिंदगी में कभी भी अपने मूर्खता पर हसन नही पड़ेगा।
।।धन्यवाद।।



बुधवार, 7 जून 2023

EK RAJA AUR USAKE TIN BETON KI KAHANI/एक राजा और उसके तीन बेटों की कहानी.

 एक राजा और उसके तीन बेटों की कहानी, राजा अब बूढ़ा हो चुका था , राजा को अपनी राज गद्दी और राज्य का सारा निर्णय अपने किसी एक बेटे को देना था , पर तीनो भी समान तौर पर काबिल थे , निर्णय लेना राजा को कठिन हो रहा था , तभी राजा ने अपने बूढे नौकर को कहा , जो किसान था , उससे पूछा की कुछ तरकीब निकालो, उस बूढ़े ने राजा को एक ही तरकीब बताई, एक दिन सुबह राजा ने अपने तीनो बेटों को बुलाया , और तीनो को एक एक गेहू का  बोरा भेट दी , और उनसे कहा की इसे संभाल के रखो, मैं तीर्थ यात्रा को जा रहा हूं,जब मैं तीर्थ यात्रा से लौटू तो मुझे ये वापस लौटा देना , तुम उत्तरदाई होगे इस अनाज के ,जैसे मैने दिया है वैसे ही लौटना है तुम्हे , तो इसे बहुत संभाल के रखो ,तीर्थ यात्रा करके आने का समय एक साल दो साल या तीन साल भी लग सकता है, तीनो ने अपने अपने गेहूं के बोरी लेके सोचने लगे , बड़े बेटे ने सोचा की मैं इसे तिजोरी मैं रख दूंगा , जब पिताजी वापस आयेंगे तो इन्हे मैं पिताजी को लौटा दूंगा, उसने बडी सावधानी से और सुरक्षा के साथ तिजोरी में रख दिया, छोटे बेटे ने उसे किसी जमीन पे फिकवा दिया , जिस जमीन पे उसने फिकवा दिया वह जमीन जंगल जैसी थी ,उसपे बहुत घास थी, बहुत सारे कंकर पत्थर थे, उसने न उस घास को काटा नही उस जमीन के कंकर पत्थर साफ किए , नही उस जमीन की जाज की की यह जमीन खेती के लिए योग्य है या नही , नही उसे खेती के बारेमे कोई जानकारी थी, तीसरे बेटे ने सोचा , की अगर मैं , इसे बड़े बाई जैसे तिजोरी में रखी तो वाह कुछ महीने बाद खराब हो जायेंगे, राख हो जायेंगे, मैं इससे खेती करूंगा , जो बाद में एक बोरी के कई बोरी बनेंगे , उसने एक जमीन ली , उसमेसे सभी घास काट दी, कंकर पत्थर साफ किए, जमीन की जाज की , और उसे उपजाव बनाया, फिर उसमे गेहूं के बीज बोए, तीन साल के बाद उनके पिताजी वापस आए , और अपने तीनो बेटो से मिले, और अपने गेहूं की बोरी वापस मांग ली, बड़े बेटे ने बड़ी सुरक्षा के साथ अपनी बोरी तिजोरी से बाहर निकली और , अपने पिताजी को सोप दी, पिताजी ने बोरी को खोल के देखा तो सब दाने राख हो चुके थे , सब सड़ गाएं थे , राजा ने उसे कहा , मैं ने तो तुम्हे जीवित गेहु के  दाने दिए थे, जो विकसित हो सकते थे, जिसे तुम तीन सालो में कई हजार दाने तयार करते, इसकी कीमत तुम नही समझ पाए ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌, और तुमने जीवित दाने मार दिए, तो तुम राज कैसे संभालो गे , इसीलिए मैं तुम्हे ये राज्य नही दे सकता , फिर राजा ने अपने छोटे बेटे से कहा की तुम्हारे दाने कहा है , उसने कहा में तो उसे , किसी जमीन पे फेक आया , तो राजा ने उससे पूछा की क्या गेहूं की फसल आई , उसने कहा , मैं ने देखा ही नहीं इन तीन सालो ने , राजा और उसके बेटे ने जाके देखा , की वहा पर कुछ भी नही था, केवल घास ही घास थी , राजा ने कहा तुमने भी , जीवित दानो को मार दिया , तब छोटे बेटे ने कहा , ऐसे तो कही पेड़ बिना लगाए उगते है , फिर उसे बो देने की क्या जरूरत है , राजा ने कहा की तुम भी ना समझ हो, तुम पर भी में भरोसा नही कर सकता , तुम्हे भी मैं ये राज्य नही दे सकता, तब राजा ने , अपने मंजले बेटे से कहा , की तुमने क्या किए गेहूं के दानों का , उसने राजा को , खेती में लेके गया , तब राजा को अपने मंजले बेटे ने चारो तरफ फैला हुवा गेहूं का खेत दिखाया , और कहा ये सब आपके उस बोरी से मैं ने यह खेत इन तीन सालो मे बनाया , राज देखके बहुत खुश हुवा, चारो तरफ हरियाली ही हरियाली , सुगंधित हवा, सूरज की किरणे पेड़ो पे चमक रही थी , राजा प्रसन्न होकर उसने अपने मंजले बेटे को अपनी राज गद्दी सोफ दी, इस तरह से बहुत आसानी से और समझदारी से राजा ने , राज्य को नया और सबसे अनोखा युवराज दिया ,

इस कहानी का बोध यह है ,, परमात्मा भी हमे छोटे छोटे बीज रूप मै कई अवसर देता है , उस अवसर में बड़ी संभावना होती है नया और बड़ा राज्य करने की ,पर हम भी राजा के तीन बेटो के जैसा व्यवहार करते है, कई लोग मिला हुवा धन तिजोरी में रखते , जो मरने के बाद राख हो जाता है , ना उससे वो अधिक धन कमाता है , नही किसी को मदत करता है , कुछ लोग मिला हुवा धन को , ऐसे ही किसी जगह पर लगा देते है , बाद में न उसके ऊपर ध्यान देते है नही उसकी चिंता करते है , पर बदमे उनके हात मे खालि पछतावा हि रहता है. अपने पैसे के व्यवहार के राजा के मंजले बेटे जैसा करना चाहिए, जो कही गुना बड़े , जिससे खुद का भरण पोषण हो जाए और दुसरो का भी , 

। । ध न्य वा द। । 




शनिवार, 6 मई 2023

AUSKER WIELD STORY/आस्कर वील्ड की ये बहुत हि पुरनि कहानी है

 आस्कर वील्ड की ये बहुत हि पुरनि कहानी है ,आस्कर बहुत ही क्रूर किस्म का आदमी था , उसने अपने जीवन काल में बहुत ही उपद्रव, चोरी , बलात्कार , ऐसे न जाने कितने अपराध किए, एक दिन वह मर गया , मरने के बाद उसकी आत्मा, परमात्मा के पास चली गई, परमात्मा ने उसे पूछा, की तुमने पूरे जीवन काल में कोई भी अच्छा काम नही किया .उस आदमी ने कहा हा, मैने कोई भी अच्छा काम नही किया , परमात्मा ने कहा , तुमने खून किए ,चोरी की , बलात्कार किए , इसका तुम्हे जराभि अफसोस नहीं है, उसने कहा नही है , फिर परमात्मा ने कहा की ये सब तुमने किसी के कहने से किया , उसने कहा नही , में ने खुद किया , और इसका अफसोस भी नही मुझे , परमात्मा ने कहा की तुम्हारे चेहरे पे कोई दर शिकन नहीं है तुम एकदम शांत हो , क्यों, उस आदमी ने कहा , मुझे मालूम है मैने क्या किया और इसका उत्तरदाई भी मैं हु, परमात्मा ने कहा की तुम कैसे इंसान हो तुम्हे जरा भी डर नहीं लग रहा है , में तुम्हे नर्क भेज दूंगा , तब उस आदमी ने  कहा की तुम मुझे नर्क नही भेज सकते हो , क्यू की मैं नर्क से ही इदर आया हु , में नर्क में रहके आया हु, तो तू मुझे नर्क का भय मत दिखा, इतने साल मैं नर्क में ही रहता आया हु , फिर परमात्मा ने कहा की मै तुझे स्वर्ग लोक भेज देता हु , तो उस आदमी ने कहा , की तुम वहा भी नही भेज सकते ,मुझे स्वर्ग में रहने की आदत नही है ,नही मै कभी रहा हू , गर तुम मुझे स्वर्ग भेज दोगे तो मैं उसे नर्क बना दूंगा , क्यों कि मैं अपने स्वभाव को नही बदल सकूंगा , परमात्मा होने के बाद भी परमात्मा सोचने लगा , की मैं इसे भेजू तो कहा भेजूं, इसकी बात तो बिलकुल सही है , रहा तो ये नर्क में स्वर्ग में कैसे रहेगा और इसकी आदत भी नही बदलेगी , फिर परमात्मा ने सोचा की इसे यही छोड़ देता हु , और थोड़ा विचार करके कुछ मार्ग निकलता हूं,

बोध,, दोस्तो इस कहानी का मतलब यही है , की जबतक तुम न चाहो तब तबतक तुम्हे परमात्मा भी नही बदल सकता है , तुम्ही हो तुम्हारे जीवन के शिल्पकार, सभी उपद्रव , अच्छा , बुरा ,ये सब अपने भीतर है , इसे कोई भी बदल नही सकेगा जब तक तुम न चाहो , तो अपनी सोच को सकारात्मक रखो, कर्म पे विश्वास रखो, अच्छे कर्म करो , इससे आपकी हस्त रेखा भी अच्छे कर्म के स्वरूप बदल जायेगी,

। । धन्यवाद । । 



बुधवार, 3 मई 2023

SIKANDER AUR USAKI AMARTA KI KAHANI/सिकंदर और उसकि अमरता की कहानी.

सिकंदर और उसकि अमरता की कहानी, सिकंदर को कोई ऐसा नहीं होगा जो नही जानता , पूरे विश्व को जीत चुका था, जीत की भूख इतनी थी कि , सब कुछ जीत लिया , अब उसे अमर होने की लालसा लग गई , कई साल प्रयास करने के बाद , उसे किसी ने कहा की , पृथ्वी के बीचों बीच जमीन के नीचे एक गुफा है , उस गुफा के अंदर कई मिल चलने के बाद एक झरना है, उस झरना का पानी पीने से कोई भी जीव अमर  हो जाता है। बहुत प्रयास के बाद सिकंदर को वह गुफा मिल गई, कई मिल चलने के बाद उसे वह झरना भी मिल गया , वह बहुत ही खुश हुवा, जैसे ही उसने पानी पीने के लिए अपनी हात की उंजली पानी पीने के लिए बड़ाई, सामने से एक आवाज आई की रुको, यह पानी पीने से पहले मेरी बात सुनो , फिर तुम पानी पी सकते हो , सिकंदर ने पीछे देखा तो एक कौवा, झरने के किनारे बैठा हुआ था , उसकी हालत बहुत ही खराब थी , पंख झाड़ चुके थे , पैर के पंजे गल गए थे , शरीर पर , पंख का एक भी पीस नही था , एकदम बूढ़ा और मरने के हालात में था वह कौवा, सिकंदर ने इस कौवे से पूछा तुम कोन हो , और ये तुम्हारी हालत किसने की, कौवे ने कहा कि मैं भी तुम्हारी तरह अमर बनने के लिए इस गुफा के झरने का पानी पीने के लिए आया था  , कई साल हो गए मैं , यह ही बैठा हु , न उड़ सकता हु नही चल सकता हु , न भूख लगती है नही प्यास , शरीर भी कमजोर हुवा है , शरीर के ऊपर कुछ भी नही बचा है , खाली जान बची है , मैं भी यह पानी पीने के बाद अमर हो गया , पर कुछ सालो के बाद मैं बूढ़ा होगया , सब कुछ खत्म हो गया , पर जान नही जाती, में भगवान से रोज प्रार्थना करता हु की मुझे मृत्यु दे मैं नही जी सकता ऐसी हालत में, पर मृत्यु नही आ सकेगि क्यों की मैं अमर हु, कौवे ने कहा ये सिकंदर तू ऐसी भूल न कर , जरा सोचले ध्यान से , फिर ये पानी पीना , तुम कुछ सालो के बाद बूढ़े होजावोगे, शरीर में ताकत नहीं बचेगी , तुम तुम्हारा अस्तित्व खत्म होते देखोगे पर कुछ कर नही पावोग , फिर तुम्हे रहने न रहने से कूच फर्क नहीं पड़ेगा ,तुम चहके भी कुछ कर नही पवोगे,और तुम्हारी भी हालत मेरे जैसे हो जायेगी मृत्यू की राह देखोगे और मृत्यु कभी आयेगे नही, तुम पहले जाके ऐसा झरना तलाश करो की कोई भी अमर हुवा जीव उस पानी को पीने से मृत्यू को प्राप्त हो जाए , फिर तुम यह पानी पी सकते हो, क्यों कि मृत्यू ही अंतिम सत्य है ,सभी पीड़ा का अंत मृत्यु ही है , मेरी बात पूरी होगई अब तुम्हारी मर्जी, यह सुनने के बाद सिकंदर की आखें खुल गई , और वह वहा से चला गया , 

बोध ,, की तुम चाहे कितना भी कुछ पलों पूरे विश्व को जीत लो, पर मृत्यु को कभी जीत नही पावोगे. मृत्यु ही अंतिम सत्य है , सारे दुख दर्द , पीड़ा , गर्व अहंकार  लालच पैसा इन सबका अंत मृत्यु ही है , बहुत ज्यादा लालच भी हमको बहुत बड़ा धोका दे सकती है , तब ऐसे समय में , हमारी जीवन में कोई एक  कौवे जैसा दोस्त होना चाहिए , जो हमको सही गलत और उसका परिणाम क्या होगा इसके बारे में बताने के लिए,

। । धन्यवाद। । 


शनिवार, 29 अप्रैल 2023

EK DHANURDHAR KI KAHANI/एक धनुर्धर की कहानी

 एक धनुर्धर की कहानी, एक सम्राट ने अपने धनुर्विध को कहा की तुजसे बड़ा धनुर्विध इस राज्य में और इस संसार में मुझे नजर नहीं आता , तो तू घोषणा कर दे की मुझसे बड़ा धनुर्धारी है तो वो मुझसे सामना करे , मुझे हराके दिखाए, तब मैं इस देश के सबसे महान धनुर्विध तुम्हे घोषित करूंगा , उसने राजा से कहा उसकी कोई जरूरत नहीं कोई भी मुझसे बड़ा इस संसार में नही है , तभी  एक बूढ़ा द्वारपाल हसा, उसने घोषणा करने के बाद उस द्वारपाल से कहा की तुम क्यू हस रहे थे , क्या बात है , क्या तुमको मुजपर शक है , तो उस द्वारपाल ने कहा , तुम्हे धनुर्विद्या का ज्ञान कहा है  ,तुमसे बड़ा धनुर्विध इस संसार में है तुम तो कुछ भी नहीं और तुम्हे आता ही क्या , ऐसा सुन के वह बहुत ही शांत हवा और कहा की मुझे उस धनुर्विध का पता बताओ मैं उसे मिलता हु, उस द्वारपाल ने कहा की राज्य के पूर्व दिशा के पहाड़ी के नीचे वह रहता हैं, वह उसे ढूंढते हुवे चला गया, पहाड़ी की नीचे उसे एक बूढ़ा लकड़हारा मिला , लकड़ियाय बेच के वो अपना गुजारा करता , उस धनुर्विध ने कहा कि मैं एक महान धनुर्विध के तलाश में आया हूं, इस पहाड़ी की नीचे आप के सिवा कोई भी नही है , तो क्या आप मुझे उसका पता बतावोगे , उस बुडे ने काह की मैं ही हु, तीन दिन उस बूढ़े धनुर्विध के साथ रहने के बाद उसे पता चला कि मुझे तो कुछ आता हि नही है , तीन साल धनुर्विद्या सीखने के बाद , वह वापस लौट रहा था , तभी उसे ख्याल आया की , मैं तो अभी पूरी तरह से सिख गया अब मैं संसार का सबसे बड़ा धनुर्धारी बन गया , पर मन ही मन सोचने लगा की भले मैं कितनाही बड़ा क्यू ना हुवा पर रहूंगा तो दूसरे नंबर पर , क्यू ना मैं अपने गुरु को मार दु, वह एक पेड़ के पीछे छुप गया , उसने देखा की उसका गुरु लकड़ियां लेके आ रहा है , उसने एक तीर निकाला और गुरु को निशाना बनाकर छोड़ दिया ,गुरु ने तीर को अपने तरफ आते हुवे देखा , और अपनी लकड़ियों में से एक छोटी लकड़ी उठाई और तीर के तरफ फेंक दी, तीर घुमा और शिष्य के सीने में जाके घुस गया, गुरु शिष्य के पास जाकर तीर निकाला और उसे कहा की मैं बस तुम्हे इस धनुर्विद्या को नही सिकाया, लकड़ी का कोई भी टुकड़ा उठा के फेंका तो तीर बन जाए और किसे को लगे तो खून की एक बूंद गिरे बिगर मार जाए , पर इससे बड़ी धनुर्विद्या मैं भी अभी सिख नही पाया , खाली आंखो से किसी को भी मार दे , बिना तीर और बिना लकड़ी के , मैं मेरे गुरु को आती है , मैं जनता हू, तुम जावो वहा ,वे तुम्हे मुझसे अच्छी धनुर्विद्या सीखा देगा , इस पहाड़ी के पीछे रहते है मेरे गुरु तुम जाके उनसे मिलो, वह धनुर्विध अपने गुरु के गुरु को ढूंढने चला गया , पहाड़ी के पीछे और एक पहाड़ के ऊपर उसका घर था वाह बहुत ही बुढा था कमर झुकी हुवि थी, ठीक से चल नही पा रहा था , उस शिष्य ने कहा की आप ही हो इस संसार के सबसे महान धनुर्धारी , उस बूढ़े ने कहा की , थोड़ी बहुत आती है मुझे धनुर्विद्या , क्या तुम्हे सीखना है , उस शिष्य ने कहा नही में तो सीख के आया हूं , उस बूढ़े ने कहा सीखे हो तो इस धनुष्य को क्यू अपने कंधे से लटकाया है , उसने कहा की मैं एक तीर से १०० पक्षी योंको मार गिरा सकता हु , उस बूढ़े गुरु ने कहा की ये तो मामूली सी बात है , यह तो कोई भी कर सकता है, जमीन पे खड़े होके , तब गुरु ने कहा की मै तुम्हे जहां से बतावू वहासे क्या तुम कक्ष लगा सकते हो उसने कहा हा, तब वह बूढ़ा गुरु, एक पहाड़ी के चोटी पे जाके एक पैर के पंजे पे खड़ा हवा और खड़ा भी ऐसे जगह हुवा की संसो का नियंत्रण खो गया तो हमेशा के लिए इस संसार से गायब , पीछे बड़ी खाई और आगे ढलान वाली चट्टान , वह शिष्य तो डर गया और उसने कहा की मेरे तो हात पाव कापने लगे , तब उस गुरु ने कहा की हात पाव कपेंगे तो तुम निशाना कैसे साधोगे , तुम्हारे हात पाव कप रहे है तो तुम आत्मा पे नियंत्रण कैसे पावोंगे  , जब तुम आत्मा पे नियंत्रण रख पावोंगे तभी तुम सबसे बड़े धनुर्धारी कहलावोगे फिर तुम्हे न धनुष्य की जरूरत नहि पड़ेगी, नही लकड़ी के टुकड़े की , बस आंखो से ही तुम किसी को भी मार सकते हो , उस गुरु ने उस शिष्य को उदाहरण देते हुवे कहा की ऊपर देखो ३० पक्षी का थावा जा रहा है मैं अपनी आंखों से उन सारे पक्षियोंक मार गिरा ता हूं, उस गुरु ने ऊपर देखा अपनी आंख मिचकाई कुछ ही पल में ३० के ३० पक्षी मार के नीचे गिरे , वह शिष्य देखते ही रह गया  और वह अपने अंहकार और गर्व पर हसने लगा इक  और उसे समझ आई की पूर्ण ज्ञानी कभी भी अपने महंता का बखान नही करता , वह तो पेड़ की तरह चट्टन्नो में भी खड़ा रहता है और अपनी शीतल छाया से सबको सुख और  आनंद देता हैं.  

सिख , कभी भी अपने आप पर गर्व मत करो , ज्ञानी बनो पर अहंकारी मत बनो , आप कितने भी बड़े क्यू न हो , आप से बड़ा कही ना कही इस संसार में है, और हमेशा रहेगा.

!!ध न्य वा द!!



गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

NIRDHAN UPASAK AUR BHAGVAN BHUDDH KI KAHANI/ निर्धन उपासक और भगवान बुद्ध की कहानी.

 निर्धन उपासक और भगवान बुद्ध की कहानी, अल्वी नगर के एक गांव में एक गरीब परिवार रहता था , बहुत ही गरीब था , खेती करके अपने पेट भरते थे, एक दिन उन्हें यह मालूम हुवा की तथागत भगवान बुद्ध हमारे गांव में कल आ रहे है, वह बहुत ही खुश हुव उसने सोचा की कल में भगवान के दर्शन करके उनसे उपदेश लूंगा, कुछ सिकुगा , फिर सुबह भगवान बुद्ध अपने ५०० भिक्षु के साथ अल्वी नगर आए , अल्वी नगर वासियोने भगवान से भोजन करने के लिए आग्रह किया, भगवान वही रूक गए, वह निर्धन उपासक भी भगवान के दर्शन के लिए आतुर था , पर जब वह सुबह उठा तो उसने देखा की उसका एक बैल कही चला गया, वह उसको ढूंढने के लिए चला गया , भूखा प्यासा दिन भर उसे ढूंढता रहा, दुपहर होते होते उसने उस बैल को ढूंढ निकाला , और वैसे ही भगवान बुद्ध के दर्शन के लिए चला गया, भगवान बुद्ध ने उसे देखा और अपने पास बिठाया , और उसे भर पेट भोजन के लिए आग्रह किया, उसने मना करने के बाद भी भगवान ने उसे खाना खिलाया , और कुछ धर्म के उपदेश भगवान बुद्ध ने उस गरीब को दिए, वह सुनकर वह बहुत हि धन्य हुवा, पर यह बात भिक्षू संघ में बिजली की तरह फैल गई, सब को आशर्य हुवा, क्योंकि ऐसा कभी भी भगवान ने नही किया था , उन भिक्षु ने भगवान से जिज्ञासा कि,  आप ने ऐसा क्यों किया, पहले तो आप ने ऐसा कभी भी नहीं किया , तब भगवान बुद्ध ने इन भिक्षु से कहा कि भूखे पेट किसी को धर्म नही सिखाया जा सकता है , नही कोई उपदेश , क्यों कि इस संसार में सबसे बड़ा रोग भूख हैं भूख से बडकर रोग इस संसार में नही है , क्यों कि भूख लगने के बाद शरीर की चेतना शरीर की भूख मिटाने के लिए जुड़ जाती हैं, फिर उसे कुछ दूसरा नही सूझता, उदाहरण, जब हमारे पैर में कांटा लग जाता है तो हमारी चेतना वही पैर के पास घूमती रहती है , जैसे सिर में दर्द हो तभी भी हमारी चेतना वही सिर के पास घूमती रहती हैं, उस समय हमारा ध्यान उसी चीज पे रहता हैं , इसीलिए भूख सबसे बड़ा रोग है और संस्कार सबसे बड़ा दुख है और निर्वाण सबसे बड़ा सुख है, 

बोध : इस कहानी से हमे यह बात समझ में आई की भूखे पेट हम कुछ भी सिख नही पाते। नही धर्म नही संस्कार , क्योंकि शरीर का ध्यान पूरा भूख मिटाने में लग जाता हैं, अगर हम भूखे पेट प्राथना भी करे तो पूरी प्रार्थना पे भूख की भूख छा जायेगी.

। । ध न्य वा द। । 




Dahi aur ek ladke ki kahani/दही और एक लाडके की कहाणी

 एक गावं मे एक लड़का रहता था वह लड़का महज़ १२ साल का था , वह लड़का दिन भर खाली दही खाता रहता , उसे कुछ भी पसंद नहीं आता सिर्फ और सिर्फ दही ख...